
गणेश पूजा : आस्था या दिखावे का बड़ा खेल?
गणेश पूजा आने वाली है।
हर तरफ शोर होगा, ढोल-नगाड़े बजेंगे, लाइटें चमकेंगी, पंडाल सजेंगे और लोग एक सुर में चिल्लाएँगे –
“गणपति बप्पा मोरया!”
लेकिन क्या कभी सोचा है?
यह जयकार सच में आस्था से निकलता है, या फिर सिर्फ लाउडस्पीकर पर बजने वाला शोर बनकर रह गया है?
मूर्ति स्थापना: भक्ति या फैशन शो?
आजकल मूर्ति स्थापना एक तरह का फैशन बन चुका है।
किस पंडाल में कितनी बड़ी मूर्ति है, किसने कितनी महंगी सजावट की है, किसने कितना पैसा खर्च किया – यही चर्चा होती है।
लोग दिखावे के लिए मूर्तियाँ लाते हैं, ताकि मोहल्ले में नाम हो जाए –
“अरे भाई! इनके यहाँ तो 15 फीट की मूर्ति आई है, पूरे शहर में सबसे बड़ी!”
क्या भगवान का माप–तौल मूर्ति के साइज से होता है?
क्या आस्था की कीमत सजावट के पैसों से लगती है?
विसर्जन: श्रद्धा या अपमान?
पूजा के समय तो मूर्तियों को फूल, मिठाई और भजन मिलते हैं।
लेकिन जैसे ही विसर्जन का समय आता है, वही भगवान की मूर्ति नालों में बहाई जाती है, तालाब में उलट-पलट कर दी जाती है, और अगले दिन सुबह वही बप्पा की मूर्तियाँ टूटी–फूटी हालत में सड़कों पर पड़ी मिलती हैं।
सोचिए ज़रा!
जिस भगवान को “विघ्नहर्ता” कहकर हम घर में बुलाते हैं, अगले ही पल उनका हाल कूड़े से भी बदतर कर देते हैं।
क्या यही हमारी श्रद्धा है?
या फिर हम भगवान को भी इस्तेमाल की चीज़ समझ बैठे हैं –
“काम निकल गया, पूजा हो गई, अब फेंक दो!”
सच्चाई: भगवान से नहीं, दिखावे से प्यार
हकीकत यह है कि आज इंसान भगवान से नहीं, अपने स्वार्थ और दिखावे से प्यार करता है।
पूजा इसलिए नहीं होती कि भगवान प्रसन्न हों, बल्कि इसलिए होती है कि मोहल्ले वाले बोलें –
“वाह, इनकी आरती कितनी भव्य थी, क्या झांकी सजाई है!”
असल में तो भगवान को हमारे कर्म चाहिए, हमारी नीयत चाहिए, न कि हमारा शोर–शराबा।
पर्यावरण का खेल
ऊपर से, प्लास्टर ऑफ पेरिस और केमिकल रंगों वाली मूर्तियाँ नदियों और तालाबों को जहरीला कर देती हैं।
मछलियाँ मरती हैं, पानी गंदा हो जाता है, और हम कहते हैं – “बप्पा हमें सुख–समृद्धि देंगे।”
भाई! जिसे भगवान मानकर लाए थे, उसी की वजह से प्रकृति का नाश कर रहे हो।
ये भक्ति नहीं, पाखंड है।
समाधान: आस्था का असली रूप
अगर सच में भगवान से प्यार है, तो मूर्तियों का सम्मान करो।
👉 मिट्टी की मूर्ति लाओ।
👉 विसर्जन तालाब में नहीं, गमले में करो।
👉 पूजा दिखावे के लिए नहीं, श्रद्धा के लिए करो।
क्योंकि भगवान मूर्तियों में नहीं, बल्कि हमारे दिल और कर्मों में बसते हैं।
निष्कर्ष
गणेश पूजा का असली मतलब भक्ति है, लेकिन हमने इसे प्रतियोगिता और कारोबार बना दिया है।
सच्चाई यह है कि मूर्तियों के साथ जो अपमान होता है, वो किसी पाप से कम नहीं।
तो इस बार संकल्प लें –
भगवान को दिखावे का खिलौना नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा से पूजेंगे।
गणपति बप्पा मोरया – लेकिन दिल से, न कि सिर्फ शोर से!