गणेश पूजा और दुनिया की सच्चाई
गणेश पूजा और दुनिया की सच्चाई

गणेश पूजा और दुनिया की सच्चाई: आस्था या दिखावा?

हर साल गणेश चतुर्थी का पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। घर–घर में गणपति बप्पा की स्थापना होती है, पंडालों में भव्य मूर्तियाँ सजती हैं, और हर गली–मोहल्ला “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों से गूंज उठता है।

लेकिन सवाल यह है – क्या हम सच में भगवान की पूजा करते हैं या सिर्फ दिखावा?

मूर्तियों का सम्मान या अपमान?

गणेश पूजा के समय लोग बड़े–बड़े शिल्पकारों से मूर्तियाँ खरीदते हैं, लाखों रुपये सजावट में खर्च करते हैं, भक्ति गीत और आरती करते हैं।
लेकिन जब विसर्जन का समय आता है, तो वही भगवान की मूर्तियाँ सड़कों, नालों, तालाबों और गटर में पड़ी मिलती हैं।
कहीं हाथ टूटा होता है, कहीं सिर अलग पड़ा होता है।

क्या यही है आस्था?
जिस भगवान से हम सुख–समृद्धि और विघ्न–निवारण की प्रार्थना करते हैं, पूजा खत्म होते ही उनकी मूर्तियों का ऐसा अपमान करना – यह श्रद्धा नहीं, बल्कि स्वार्थ और दिखावा है।

असली पूजा क्या है?

असली पूजा मूर्तियों की भव्यता में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और कर्मों की पवित्रता में है।
भगवान कभी मूर्तियों में बंधकर नहीं रहते।
वो तो हमारे दिल और हमारे कर्मों में बसते हैं।

👉 यदि हम दूसरों की मदद करते हैं, माता–पिता का सम्मान करते हैं, और समाज के लिए कुछ अच्छा करते हैं – तो वही सबसे बड़ी पूजा है।

पर्यावरण और श्रद्धा का संतुलन

मूर्तियों का गंदे तालाबों और नालों में विसर्जन न केवल भगवान का अपमान है, बल्कि प्रकृति के लिए भी हानिकारक है।
प्लास्टर ऑफ पेरिस और केमिकल रंगों से बनी मूर्तियाँ नदियों और तालाबों का पानी जहरीला कर देती हैं।
इससे मछलियाँ मरती हैं और पर्यावरण असंतुलित हो जाता है।

तो क्यों न हम मिट्टी की छोटी मूर्ति लाएँ और घर के गमले में या कृत्रिम तालाब में उनका विसर्जन करें?
इससे मूर्ति का सम्मान भी होगा और प्रकृति भी सुरक्षित रहेगी।

आस्था बनाम दिखावा

आज भक्ति का असली रूप कहीं खो गया है।
लोग पूजा इसलिए नहीं करते कि भगवान खुश हों, बल्कि इसलिए करते हैं कि दूसरे लोग देखें कि हमने कितनी भव्य पूजा की है।
यही कारण है कि भगवान की मूर्तियाँ पूजा के बाद “बेकार” समझकर फेंक दी जाती हैं।

लेकिन याद रखिए –
भगवान को हमारी चमक–धमक नहीं, बल्कि सच्चा सम्मान और साफ नीयत चाहिए।


निष्कर्ष

गणेश पूजा का असली महत्व तभी है जब हम भगवान की मूर्तियों का सम्मान करें।
भक्ति का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि दिल से आस्था है।
तो आइए इस गणेश चतुर्थी पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि –

  • मिट्टी की मूर्ति का ही उपयोग करेंगे।

  • विसर्जन सम्मानपूर्वक करेंगे।

  • पूजा सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा से करेंगे।

गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया!

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