भारत में अंधविश्वास : विश्वास या विनाश?
भारत एक ऐसा देश है जिसे “विविधताओं की भूमि” कहा जाता है। यहाँ धर्म, संस्कृति, परंपराएँ और रीति-रिवाजों का बहुत बड़ा महत्व है। लेकिन दुख की बात यह है कि इन्हीं परंपराओं के नाम पर आज भी भारत का एक बड़ा वर्ग अंधविश्वास पर आँख मूँदकर भरोसा करता है।
अंधविश्वास की जड़ें
भारत में अंधविश्वास कोई नई चीज़ नहीं है। यह सदियों से समाज का हिस्सा रहा है। कभी इसे धर्म के नाम पर तो कभी परंपरा के नाम पर सही ठहराया जाता रहा। उदाहरण के तौर पर –
उल्लू के बैठने को अशुभ मानना,
बिल्ली का रास्ता काटना,
नींबू-मिर्च टाँगना,
ग्रह-नक्षत्रों के डर से घर का काम टाल देना,
इलाज के बजाय झाड़-फूँक पर विश्वास करना।
लोग क्यों भरोसा करते हैं?
डर और असुरक्षा – जब लोग किसी संकट में होते हैं तो वे अंधविश्वास को सहारा मान लेते हैं।
अज्ञानता – शिक्षा की कमी अंधविश्वास को और बढ़ावा देती है।
परंपरा का दबाव – “हमारे बाप-दादाओं ने किया है तो हमें भी करना है” जैसी मानसिकता।
धर्म और आस्था का गलत उपयोग – कई बार ढोंगी बाबाओं और तथाकथित गुरुओं के कारण लोग अंधविश्वास में फँस जाते हैं।
अंधविश्वास के दुष्परिणाम
लोग वैज्ञानिक सोच से दूर हो जाते हैं।
बीमारियों का सही इलाज न कराकर झाड़-फूँक में समय और पैसा बर्बाद करते हैं।
कई बार जानलेवा घटनाएँ भी हो जाती हैं, जैसे चुड़ैल-बिसाही के नाम पर महिलाओं पर हिंसा।
समाज पिछड़ेपन की ओर बढ़ता है और विकास रुक जाता है।
समाधान क्या है?
शिक्षा का प्रसार – जितना ज्यादा लोग पढ़ेंगे, उतना अंधविश्वास कम होगा।
वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा – बच्चों को बचपन से तर्क करना और सवाल पूछना सिखाना चाहिए।
कानूनी कार्यवाही – अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
सामाजिक जागरूकता – समाज के हर वर्ग को मिलकर अभियान चलाना होगा कि आस्था अलग है और अंधविश्वास अलग।
निष्कर्ष
भारत में अंधविश्वास पर लोगों का भरोसा अभी भी गहरा है। लेकिन अगर हमें सच में “नए भारत” का निर्माण करना है तो इस अंधविश्वास की जंजीरों को तोड़ना होगा। असली पूजा यही होगी कि हम ज्ञान, शिक्षा और विज्ञान को अपनाएँ और समाज को अंधविश्वास से मुक्त करें।